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  • Abhilasha Jain

सरकार से विनम्र निवेदन

जैन धर्म जो अहिंसा का सबसे बड़ा पुजारी है, जिनके साधुगण पूर्ण परिग्रह का त्याग कर भगवान बनने का पुरुषार्थ कर रहे हैं, मानो इस धरती के भगवान ही हैं! भगवान के द्वारा बताए गए पांचों पाप - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील व परिग्रह - का पूर्ण त्याग करते हैं साधुगण, व उसका एक देश त्याग करते हैं श्रावकगण, जो साधु तो नहीं है पर आम जनता से कहीं ऊपर उठकर अपना जीवन सादगी से जीते हैं।

कुछ तो साधुओं के साथ संघ में ही रह कर तपस्या करते हैं, पर कुछ अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए घर पर ही अपनी साधना करते हैं। वह दोहरी मार सहन करते हैं, घर के काम से निवृत होते ही अपना समय प्रभु भक्ति में लगाते हैं। व्यर्थ ही समय नहीं गवाते। समाज या प्रशासन के विरोध में कोई कार्य नहीं करते कानून की बात का अक्षरश: से पालन करते हैं । कानून के नियमों का उल्लंघन करना उनके अतिचारों में आता है, पर बिना देवदर्शन भोजन भी स्वीकार नहीं करते। अभी देश संकट की घड़ियां गुजार रहा है, ऐसे में इन हालातों से उबरने में उन व्रतियों के द्वारा भाई गई विश्व कल्याण की भावना भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वह भी किसी सैनिक या डॉक्टर से कम नहीं है। अगर देश पर किसी तरह का संकट आया है, तो वह अपनी पूरी साधना लगा देंगे इससे उबरने के लिए।


पर यहां प्रश्न खड़ा होता है, सरकार ने सभी की व्यवस्था की है, जबकि दूध, सब्जी, फल वगैरह के बिना तो हम दाल रोटी खाकर जी सकते हैं पर प्रभु दर्शन के बिना एक नेस्ठीक श्रावक भोजन का एक टुकड़ा भी स्वीकार नहीं करेगा, हमारे माननीय लोग धर्म को इतनी सूक्ष्मता से नहीं जानते इसलिए उन्होंने सभी मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों को बंद करवा दिया है, सही भी है, देश हित के लिए हमें कठोर कदम उठाना ही होगा।


जहां सभी दर्शनों में भगवान की पूजा भक्ति की जाती है, पर दर्शन के अभाव में फोटो को ही प्रतीकात्मक मानकर पूजा कर लेते हैं पर जैन दर्शन इसको स्वीकार नहीं करता, जो निष्ठा पूर्वक व्रतों को स्वीकार करता है, वह उपसर्ग आने पर दुर्भिक्ष होने पर ,बुढ़ापा आने पर ,ऐसा कोई रोग होने पर जिसका इलाज संभव ना हो, या महामारी फैलने पर ,सल्लेखना को स्वीकार कर लेता है।

देश में ऐसा भी समय नहीं आया है कि व्रतीगण अपने घरों में बैठकर साधना तो करें पर सल्लेखना को स्वीकार करें । उनके हित को देखते हुए जब तक देश लोक डाउन है तब तक सिर्फ व्रतियों के दर्शन के लिए जैन मंदिर 1 घंटे के लिए ही खुलना चाहिए, चाहे वहां अंग रक्षकों को तैनात किया जाए ताकि आम जनता ना आए और व्यर्थ की भीड़ ना हो, यह जानकारी आप तक इसलिए पहुंचा रहे हैं कहीं ऐसा ना हो कॉरोना से बचने के लिए व्रतियों को ही बलिदान कर दे।

इसके लिए हमारे सम्मानीय लोग आगे आए और व्रतियों को सम्मान से अपनी निगरानी में जिनेंद्र प्रभु के दर्शन कराएं, जिससे वे अपना आहार ग्रहण कर सके। जय जिनेंद्र नीलकमल

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